वर्तमान (2020) में भारतीय कृषकों की दशा

वर्तमान (2020) में भारतीय कृषकों की दशा

भूमिका




प्रारंभ से ही कृषकों को देश की रीढ़ और कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में जाना जाता है।

और यही वजह है कि कृषक और कृषि के उत्थान के लिए वर्तमान सरकार के प्रत्येक स्तर पर कृषकों और कृषि के लिए विभिन्न योजनाएँ बनाई जाती है। इस तरह की कृषि और किसान से सम्बंधित किसान कल्याणकारी योजनाएँ प्रति वर्ष बनाईं जाती हैं।

कृषि और किसान से सम्बंधित योजनाएँ

1. निः शुल्क बीजों का वितरण।

2. निः शुल्क कीटनाशकों  का वितरण।

3. निः शुल्क उर्वरकों का वितरण।

4. अनुदान से संबंधित योजनाएँ।

इस योजनाओं के अंतर्गत किसानों को कृषि हेतु आवश्यक सामग्री कई बार निः शुल्क या कई बार अनुदान में दी जाती है।

सरकार द्वारा हर स्तर पर किसानों और कृषि की उन्नति के लिये इतनी महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाईं जाती हैं, परन्तु क्या वजह है कि अधिकांश कृषकों की दशा में सुधार हो ही नहीं पाती?


इस पोस्ट के माध्यम से इन्ही कारणों पर चर्चा करेंगे


कृषकों की दशा में सुधार न होने के संभावित कारण

कृषकों की दशा में सुधार न होने के संभावित और ज्ञात कारण निम्न. हैं:

1. बिचौलिये।

2. मंडी का अभाव।

3. समर्थन मूल्य।

4. ग्राहक।

5. कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की कमी।


बिचौलिये

सीमांत, लघु एवं मध्यम वर्गीय कृषकों के द्वारा मौसम के अनुसार खेती की जाती है। परन्तु असली समस्या की शुरुआत फसल की कटाई के पश्चात होती है क्योंकि इन कृषकों के पास परिवहन के उचित साधन न होने से मार्केटिंग के ज्यादा विकल्प नहीं होते हैं। इस वजह से कच्चे उपज के खराब व सड़ने-गलने की समस्या ज्यादा रहती है। यह समस्या अधिकतर उद्यानिकी फसलों के साथ रहती है।

इन समस्याओं से निजात पाने के लिये इन कृषकों के द्वारा अपने उत्पाद की बिक्री बिचौलियों को कर दी जाती है। ये बिचौलिये बहुत ही कम दाम में उत्पाद की खरीदी किसानों से करते हैं, और फिर इन्ही उत्पाद को ज्यादा से ज्यादा दाम पर दूरस्थ बाजारों बेचते हैं। 

इस तरह किसान अपने परिश्रम का उचित इनाम पाने से वंचित रह जाते हैं।

निष्कर्ष: हालाँकि कृषकों को अपने मेहनत का सही दाम नहीं मिल पाता तथा इसके अन्य कई कारक हैं, तथापि इन सब कारकों की गहराई से अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि कृषकों का शिक्षित व जागरूक होना, एक संगठन के रूप में काम करना, अपने हितों के लिये एक साथ काम करना और उन्नति की ओर बढ़ना अति आवश्यक है।


मंडी का अभाव

कई जगहों में मंडी का अभाव होना कृषकों की खराब दशा की वजह बन जाती है, और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बहुत बड़ी समस्या है। सामान्य स्थिति में सैकड़ों ग्रामों हेतु एक सरकारी मंडी होना आम बात है। 

समस्या का समाधान: एक छोटी इकाई जिसमें अधिक से अधिक 10 - 50 ग्राम हों, हेतु मंडी की स्थापना स्थानीय प्रसाशन द्वारा की जानी चाहिए।

यहाँ यह बात जरूर हो जाती है कि मंडी फसलवार होनी चाहिए। उदाहरण के लिए- कृषि उत्पादों हेतु कृषि मंडी, दुग्ध उत्पादकों हेतु सहकारी मंडी तथा उद्यनिकी उपज हेतु भिन्न सहकारी मंडी।


समर्थन मूल्य

समर्थन मूल्य कृषकों के हौसले को गिरा या बढ़ा सकता है। उचित समर्थन मूल्य होने पर कृषक स्वयंमेव ही कृषि के सभी कामों से गहराई से जुड़ जाता है, जिसका परिणाम अधिक उत्पादन के रूप में दिखता है। अधिक उत्पादन की दशा में सरकार के पास निर्यात के विकल्प हमेशा खुला रहता है, जो देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में सहयोगी होती है।


ग्राहक

कृषकों के ग्राहक सम्पूर्ण देशवाशी होते हैं। अधिकतर देखा जाता है कि ग्राहक कम से कम दाम पर कृषि उपज की खरीदी कृषकों से करते हैं। यह स्थिति तभी उत्पन्न होती है जब कृषक व्यक्तिगत रूप से उपज की विक्री करते हैं। कच्चे उपज के खराब होने की संभावना को ध्यान में रखते हुए कृषक स्वयं ही अपने उत्पाद की बिक्री कम दामों में कर देते हैं। 

इस तरह यह कारण भी कृषकों की दशा को कमजोर करती है।


कृषक द्वारा कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का अनुसरण न किया जाना

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग खेती की एक ऐसी विधि है जिसमें किसान और एक व्यवसायी या व्यवसाय समूह के बीच समझौता होती है।

इस समझौते के अनुसार कृषक को समय पर फसल तैयार करनी होती है। फसल तैयार होने के बाद व्यवसायी समूह उस फसल की कीमत किसान को देकर फसल की कटाई कर लेता है। हालाँकि किसान को यह राशि फसल लगाने के पहले भी मिल सकती है।


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